van mahotsav essay in hindi | वन महोत्सव पर निबन्ध

van mahotsav essay in hindi | वन महोत्सव पर निबन्ध 

van mahotsav essay - दोस्तों वनों के महत्व (van mahotsav essay ) के बारे में हम सभी भली भाँती जानते हैं। हम सब  बचपन से ही पेड़ पौधों के बीच खेले -खाए ओर बड़े हुए हैं और अपनी आवश्यकता की पूर्ति हेतु वनों का दोहन करते रहे हैं यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है इस विषय पर कई बार परीक्षाओं में निबंध लेखन के लिए प्रश्न पूछा गया है। यदि आप भी इस विषय पर सरल शब्दों में आकर्षक और सटीक  निबंध लेखन करना चाहते हैं तो आपको आज की पोस्ट में वृक्षारोपण पर निबंध लिखना सिखाया। जाएगा चलिए शुरू करते हैं वृक्षारोपण या फिर वन महोत्सव पर निबंध लेखन।

van mahotsav essay in hindi | वन महोत्सव पर निबन्ध


वन महोत्सव पर निबन्ध |van mahotsav essay in Hindi 

वनों का महत्त्व
अथवा
वृक्षारोपण
अथवा
पर्यावरण संरक्षण


[विस्तृत रूपरेखा-(1) प्रस्तावना, (2) प्राचीन समय में वनों की स्थिति , (3)वनों की वर्तमान स्थिति (4) वन महोत्सव का प्रारम्भ  (5) व्रक्ष धार्मिक आस्था का प्रतीक , (6) वृक्ष धरा का गहना है (7) वृक्षों से लाभ, (8) उपसंहार।

"धरती का शृंगार वृक्ष, वृक्षों से इसे सजाओ।

हरियाली से चमक उठे जग, दस-दस वृक्ष लगाओ।"

प्रस्तावना- वृक्ष हमारे आधार हैं धरा के आभूषण है और  हमारी जीवन चक्र में वृक्ष प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूप से अहम भूमिका निभाते हैं। भारतवर्ष का मौसम और जलवायु विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। इसकी प्राकृतिक रमणीयता और हरित वैभव विश्व-विख्यात है। भारत आने वाले विदेशी पर्यटक यहाँ की मनोहारी प्राकृतिक सुंदरता देखकर मोहित हो जाते हैं। यहाँ विशेष प्रकार के औषधीय पौधे व वन पाए जाते हैं।

प्राचीन समय में वनों की स्थिति - हमारे देश की प्राचीन संस्कृति में वृक्षों की पूजा और आराधना की जाती है तथा उन्हें देवत्व की उपाधि दी जाती है। वृक्षों को प्रकृति ने मानव की मूल आवश्यकताओं से जोड़ा है। किसी ने कहा है-वृक्ष ही जल है, जल ही अन्न है और अन्न ही जीवन है। यदि वृक्ष न होते तो नदी और जलाशय न होते। वृक्षों की जड़ों के साथ वर्षा का अपार जल जमीन के भीतर पहुँचकर अक्षय भण्डार के रूप में एकत्र रहता है। वन हमारी सभ्यता और संस्कृति के रक्षक हैं। प्रकृति को दाता मान कर शान्ति और एकान्त की खोज में हमारे ऋषि-मुनि वनों में रहते थे। वहीं उन्होंने तत्त्व ज्ञान प्राप्त किया और वहीं विश्व कल्याण के उपाय सोचे। ऐसे ही घने जंगलों के बीच गुरुकुल होते थे, जिसमें भावी राजा, दार्शनिक, पण्डित आदि शिक्षा ग्रहण करते थे। आयुर्वेद के अनुसार पेड़-पौधों की सहायता से मानव को स्वस्थ एवं दीर्घायु किया जा सकता है। 

वनों की वर्तमान स्थिति - तीव्र गति से जनसंख्या बढ़ने तथा राष्ट्रों के औद्योगिक विकास कार्यक्रमों के कारण पर्यावरण की समस्याएं गम्भीर हो रही है। प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग से पर्यावरण बिगड़ता जा रहा है। वृक्षों की भारी तादाद में कटाई से जलवायु बदल रही है। ताप की मात्रा बढ़ती जा रही है, नदियों का जल दूषित हो रहा है, वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्रा बढ़ रही है।इससे भावी पीढ़ी के स्वास्थ्य को खतरा है। वर्तमान में वन क्षेत्र कम होते जा रहे हैं जिससे जैव विविधता पर बहुत बड़ा खतरा बना हुआ है। कई प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं और कई लुप्त होने की कगार पर आ पहुंची हैं।

वन महोत्सव का प्रारम्भ- जलवायु की नीरसता और शुष्कता को दूर करके पुनः प्राकृतिक सुरम्यता और रमणीयता लाने हेतु भारत सरकार ने 1950 में वन महोत्सव की योजना प्रारम्भ की। नये वृक्ष लगाये जाने और वृक्षारोपण की एक क्रमबद्ध योजना प्रारम्भ हुई।

वृक्ष धार्मिक आस्था के प्रतीक-वृक्षों के महत्त्व एवं गौरव को समझते हुए हमारी प्राचीन परम्परा में इनकी आराधना पर बल दिया गया। पीपल के वृक्ष की पूजा करना, व्रत रखकर उसकी परिक्रमा करना, जल अर्पण करना पुण्य है और पीपल को काटना पाप करने के समान है। यह धारणा वृक्षों की सम्पत्ति की रक्षा का भाव प्रकट करती है। प्रत्येक हिन्दू घर के आँगन में तुलसी का पौधा अवश्य पाया जाता है। तुलसी पत्र का सेवन प्रसाद में आवश्यक माना गया है। बेल के वृक्ष, फल और बेलपत्र की महिमा इतनी है कि वे शिवजी पर चढ़ाये जाते हैं। 'सर्वरोगहरो निम्बः' यह नीम वृक्ष का महत्त्व है। कदम्ब वृक्ष को श्रीकृष्ण का प्रिय पेड़ बताया है तथा अशोक के वृक्ष शुभ और मंगलदायक हैं। इन वृक्षों की रक्षा हेतु कहते हैं कि हरे वृक्षों को काटना पाप है। सायंकाल किसी वृक्ष के पत्ते तोड़ना मना है-कहते हैं कि वृक्ष सो जाते हैं। ये सब हैं हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक जिसमें वृक्षों को ईश्वर स्वरूप, वन को सम्पदा और वृक्षों के काटने वालों को अपराधी कहा जाता है।

वृक्ष धरा का गहना हैं- वनों से धरा हरी - भरी और श्रंगार की हुई नायिका के प्रति सुंदर प्रतीत होती है। वृक्षों की अधिकता पृथ्वी की उपजाऊ शक्ति को भी बढ़ाती है। मरुस्थल को रोकने के लिए वृक्षारोपण की महती आवश्यकता है।भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ का जन-जीवन खेती पर निर्भर रहता है, खेती के लिए जल की आवश्यकता होती है। सिंचाई का उत्तम साधन बारिश का जल है। यदि वर्षा न हो तो नदी, जलाशय, झरने, ट्यूबवेल इत्यादि भी सूख जायें। इनके जल की पूर्ति भी वर्षा करती है। अनुकूल वर्षा होती है तो हम उसे ईश्वर की कृपा समझकर प्रसन्न होते हैं और तृप्ति का अनुभव करते हैं। वृक्ष वर्षा के पानी को सोखकर धरती के भीतर पहुँचा देते हैं। इसी से धरती उपजाऊहोती है। वृक्षों की परोपकारिता के विषय में कहा भी गया है-

“वृक्ष धरा के भूषण हैं, करते दूर प्रदूषण हैं।

वृक्षों के हैं ये उपकार, शीतल छाया मंद वयार ॥ "

वृक्षों से लाभ-वृक्षों से स्वास्थ्य लाभ होता है क्योंकि मनुष्य की श्वास प्रक्रिया से जो दूषित हवा बाहर निकलती है, वृक्ष उन्हें ग्रहण कर हमें बदले में स्वच्छ हवा देते हैं। आँखों की थकान दूर करने और तनाव से छुटकारा पाने के लिए विस्तृत वनों की हरियाली हमें शान्ति प्रदान कर आँखों की ज्योति को बढ़ाती है। वृक्ष बालक से लेकर बुजुर्गों तक सभी के मन को भाते हैं। इसलिए हम अपने घरों में छोटे-छोटे पेड़-पौधे लगाते हैं। वृक्षों पर अनेक प्रकार के पक्षी अपना घोंसला बनाकर रहते हैं और उनकी कल-कल मधुर ध्वनि पर्यावरण में मधुरता घोलती है। वृक्षों के अनेक प्रकार के स्वाद के फल हमारे भोजन को रसमय और स्वादिष्ट बनाते हैं। इनकी छाल और जड़ों से दवाइयाँ बनती हैं। अनेक पशु वृक्षों से अपना आहार ग्रहण करते हैं। वृक्षों से मानव को अनेक लाभ हैं-ये वर्षा कराने में सहायक होते हैं। वृक्षों के अभाव में वर्षा नहीं होती और वर्षा के अभाव में अन्न का उत्पादन नहीं हो पाता। ग्रीष्मकाल में वृक्ष हमें सुखद छाया और मन्द पवन (हवा) देते हैं। सूखे वृक्ष ईंधन के काम आते हैं। गृह निर्माण, गृह सज्जा, फर्नीचर, काष्ठ शिल्प के लिए हमें वृक्षों से ही लकड़ी मिलती है। कागज, गोंद आदि भी वृक्ष से कच्चा माल ग्रहण करके बनते हैं। कई सुगन्धित, तेल, खाद्य सामग्री में सुगन्ध ये सब भी वृक्षों से प्राप्त होते हैं। आँवला-चमेली का तेल, गुलाब, केवड़े का इत्र, जल, की खुशबू ये सभी वृक्षों और उनकी जड़ों से बनते हैं। 

उपसंहार- वृक्षों से हमें नैतिकता परोपकार और विनम्रता की शिक्षा मिलती है। वृक्ष स्वयं अपने फल नहीं खाते हैं। कहा भी गया है-

"वृक्ष कबहुं नहिं फल भखें, नदी न संचै नीर।

परमारथ के कारणे, साधों धरा शरीर ॥ "

वृक्ष जितना अधिक फल-फूलों से लदा होगा उतना ही झुका हुआ रहता है। हम जब देखते हैं कि सूखा कटा हुआ पेड़ भी कुछ दिनों में हरा-भरा हो जाता है जो जीवन में आशा का संचार कर धैर्य और साहस का भाव जगाता है। हमें अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना चाहिए। वृक्षारोपण करके ही हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए जीवनदायी वातावरण सृजित कर सकते हैं।

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Note:- छात्रों मुझे उम्मीद है कि आपको वन महोत्सव पर यह निबंध पसंद आया होगा अपने दोस्तों को जरुर शेयर करें।


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